कैंची धाम नहीं, UP का नीब करौरी गांव है बाबा की पहली तपोभूमि! नाम के पीछे छिपी है रोचक कथा
नई दिल्ली। नीम करौली बाबा का नाम सुनते ही सबसे पहले नैनीताल का कैंची धाम याद आता है। देश-दुनिया में प्रसिद्ध यह धाम बाबा की आध्यात्मिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। हालांकि, बाबा की पहली तपोभूमि उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले का नीब करौरी गांव मानी जाती है। इसी गांव से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार ट्रेन से उतारे जाने के बाद बाबा के चमत्कार से ट्रेन रुक गई थी। बाद में उनकी शर्त पर यहां रेलवे स्टेशन बनाया गया, जिसका नाम नीब करौरी रेलवे स्टेशन रखा गया।
कैसे पड़ा नीम करौली बाबा नाम?
कहा जाता है कि नीम करौली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण था। बचपन से ही उनका झुकाव अध्यात्म और भक्ति की ओर था। करीब 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर साधना का मार्ग अपना लिया।
आध्यात्मिक यात्रा के दौरान वह गुजरात पहुंचे, जहां उन्होंने एक महंत की शरण ली और उन्हें लक्ष्मणदास नाम मिला। साधना के कई वर्षों बाद वह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव पहुंचे। यहां उन्होंने लंबे समय तक तपस्या की। उनकी आध्यात्मिक साधना और चमत्कारों की चर्चाओं के चलते लोग उन्हें नीब करौरी बाबा कहने लगे। समय के साथ यही नाम बदलकर नीम करौली बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
जब अंग्रेज अफसर के कहने पर बाबा को ट्रेन से उतारा गया
नीब करौरी बाबा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में एक घटना उनके साधना काल की बताई जाती है। कहा जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। जांच के दौरान उनके पास टिकट नहीं मिला। अंग्रेज अफसर के कहने पर टीटी ने उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया।
बाबा ट्रेन से उतरकर पास में ही बैठ गए और साधना करने लगे। इसके बाद, कथा के अनुसार, ड्राइवर ने ट्रेन चलाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। इंजन की जांच की गई, उसमें कोयला भी डाला गया, फिर भी ट्रेन अपनी जगह से नहीं हिली।
बाबा के सामने झुके अंग्रेज अफसर
ट्रेन के रुक जाने के बाद यात्रियों को बाबा की याद आई। उन्होंने बाबा से दोबारा ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया, लेकिन बाबा तैयार नहीं हुए। यात्रियों ने टीटी और अंग्रेज अफसर को बाबा से क्षमा मांगने की सलाह दी।
कहा जाता है कि इसके बाद टीटी और अंग्रेज अफसर बाबा के पास पहुंचे और उनसे माफी मांगी। बाबा ट्रेन में वापस बैठने के लिए राजी हुए, लेकिन उन्होंने दो शर्तें रखीं।
पहली शर्त थी कि किसी साधु-संत को अपमानित करके ट्रेन से बाहर न निकाला जाए। दूसरी शर्त थी कि जिस नीब करौरी गांव में उन्हें ट्रेन से उतारा गया था, वहां एक रेलवे स्टेशन बनाया जाए।
कथा के अनुसार, दोनों शर्तें स्वीकार कर ली गईं और बाद में वहां रेलवे स्टेशन बनाया गया, जिसे नीब करौरी रेलवे स्टेशन के नाम से जाना गया।
कहानी आज भी श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय
नीम करौली बाबा की यह कथा आज भी उनके भक्तों और श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय है। हालांकि, इस घटना से जुड़े चमत्कारों का वर्णन मुख्य रूप से लोककथाओं और भक्तों की मान्यताओं में मिलता है। बाबा की आध्यात्मिक विरासत आज भी कैंची धाम समेत देश के कई स्थानों पर श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।
