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संत प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, दर्शन कार्यक्रमों पर भी रोक

 
Premananad
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वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज (Premanand Maharaj) की पदयात्रा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। इसके साथ ही एकांतिक दर्शन और वार्तालाप कार्यक्रमों पर भी फिलहाल रोक लगा दी गई है। इस फैसले के बाद श्रद्धालुओं में मायूसी देखी जा रही है।

हालांकि केली कुंज आश्रम की ओर से इस निर्णय के पीछे कोई आधिकारिक वजह स्पष्ट नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि अधिक मास के दौरान बढ़ती श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।

इन दिनों संत प्रेमानंद महाराज रोजाना केली कुंज आश्रम से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित सौभरी वन तक पदयात्रा कर रहे थे। रात करीब 3 बजे शुरू होने वाली इस यात्रा में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे थे।

शनिवार को हालात इतने अधिक भीड़भाड़ वाले हो गए कि आश्रम से लेकर सौभरी वन तक रास्ते श्रद्धालुओं से भर गए। स्थिति ऐसी थी कि पैदल चलने तक की जगह नहीं बची। व्यवस्था संभालने में सेवादारों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। काफी प्रयासों के बाद पदयात्रा को सुरक्षित तरीके से पूरा कराया गया।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई सूचना

आश्रम की ओर से कोई औपचारिक प्रेस नोट जारी नहीं किया गया, लेकिन सोशल मीडिया पर एक सूचना पत्र तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें लिखा है कि पूज्य महाराज श्री की आज्ञा अनुसार सौभरी कुंड तक होने वाली प्रातःकालीन पदयात्रा, एकांतिक वार्तालाप और दर्शन कार्यक्रम अगले आदेश तक स्थगित किए जाते हैं।

अधिक मास को माना जा रहा मुख्य कारण

माना जा रहा है कि अधिक मास के दौरान वृंदावन में लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। इस दौरान परिक्रमा और दर्शन के लिए भारी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। ऐसे में किसी प्रकार की अव्यवस्था या सुरक्षा संबंधी समस्या से बचने के लिए कार्यक्रमों को अस्थायी रूप से रोका गया है।

13 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर

संत प्रेमानंद महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम शंभू नारायण पांडे और माता का नाम रामा देवी है। बचपन में उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था।

बताया जाता है कि वह बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने कक्षा 8 तक शिक्षा प्राप्त की। बचपन में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर शिव मंदिर के लिए चबूतरा बनवाने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। इस घटना से उनका मन बेहद आहत हुआ और उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया।

कानपुर से होते हुए वह काशी पहुंचे। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य जीवन अपनाने का निर्णय लिया। शुरुआती दिनों में उनका नाम ‘आरयन ब्रह्मचारी’ रखा गया। काशी में उन्होंने करीब 15 महीने बिताए और गुरु गौरी शरण जी महाराज से दीक्षा ली। इसके बाद वह मथुरा और फिर वृंदावन पहुंच गए।

कैसे बने राधावल्लभी संत

वृंदावन में रहने के दौरान प्रेमानंद महाराज प्रतिदिन बांके बिहारी जी के दर्शन करने जाते थे। धीरे-धीरे उनकी रुचि रासलीला और राधावल्लभ परंपरा की ओर बढ़ने लगी।

एक दिन उन्होंने एक संत को श्री राधारससुधानिधि का श्लोक पढ़ते सुना, लेकिन उसका अर्थ समझ नहीं पाए। बाद में वृंदावन परिक्रमा के दौरान उन्होंने एक सखी को वही श्लोक गाते सुना। श्लोक से प्रभावित होकर उन्होंने उसका अर्थ पूछा। तब उन्हें बताया गया कि इसे समझने के लिए राधावल्लभी होना आवश्यक है। इसी घटना के बाद उन्होंने राधावल्लभ संप्रदाय को अपना लिया।