Sawan 2026 : 3 अगस्त को सावन का पहला सोमवार, शिवलिंग पर भूलकर भी न चढ़ाएं ये 6 चीजें
सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु विशेष रूप से सोमवार का व्रत रखते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक कर भोलेनाथ से सुख, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मांगते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव सच्ची श्रद्धा से अर्पित की गई पूजा को सहज स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी वस्तुएं भी हैं जिन्हें शिवलिंग पर चढ़ाना वर्जित माना गया है।
मान्यता है कि इन वस्तुओं को अर्पित करने से पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता। आइए जानते हैं वे कौन-सी चीजें हैं जिन्हें शिवलिंग पर नहीं चढ़ाना चाहिए।
1. तुलसी के पत्ते
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता तुलसी का पूर्वजन्म वृंदा के रूप में हुआ था। वृंदा के पति जलंधर का वध भगवान शिव ने किया था। इसी कारण शिव पूजा में तुलसी के पत्ते अर्पित नहीं किए जाते।
2. हल्दी
हल्दी का संबंध मुख्य रूप से सौभाग्य और श्रृंगार से माना जाता है, जबकि भगवान शिव वैराग्य और तपस्या के प्रतीक हैं। इसलिए शिवलिंग पर हल्दी चढ़ाने की परंपरा नहीं है।
3. केतकी और केवड़ा के फूल
शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी के असत्य का साथ दिया था। इससे भगवान शिव ने उसे अपनी पूजा में वर्जित कर दिया। इसलिए केतकी और केवड़ा के फूल शिवलिंग पर नहीं चढ़ाए जाते।
4. नारियल का पानी
भगवान शिव को साबुत नारियल अर्पित किया जा सकता है, लेकिन नारियल के पानी से अभिषेक नहीं किया जाता। धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर अर्पित वस्तुएं 'निर्माल्य' हो जाती हैं, जबकि नारियल का पानी सामान्यतः ग्रहण किया जाता है।
5. शंख से जल अर्पित करना
मान्यता है कि भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था। इसी कारण शिव पूजा में शंख का प्रयोग नहीं किया जाता और शंख से जल भी अर्पित नहीं किया जाता।
6. टूटे या खंडित बेलपत्र
भगवान शिव को हमेशा ताजे, स्वच्छ और तीन पत्तियों वाले अखंड बेलपत्र ही अर्पित करने चाहिए। टूटे, सूखे या कीड़े लगे बेलपत्र चढ़ाना शुभ नहीं माना जाता।
भगवान शिव को क्या अर्पित करना शुभ माना जाता है?
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शुद्ध जल या गंगाजल से अभिषेक
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ताजे और अखंडित तीन पत्तियों वाले बेलपत्र
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कच्चा गाय का दूध, दही और शहद
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धतूरा, आक (मदार) के फूल और भांग
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सफेद चंदन और पवित्र भस्म
नोट: ये मान्यताएं हिंदू धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक आस्थाओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा-विधि में कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं।
