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17 बार टूटा, फिर भी नहीं झुका... गजनवी से औरंगजेब तक नहीं मिटा पाए, जानिए प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर के 75 साल के पुनर्जागरण की कहानी

सोमनाथ मंदिर के 75वें अमृत महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष पूजा, महारुद्र यज्ञ और ऐतिहासिक कुंभाभिषेक में शामिल होंगे। 17 बार हमलों का सामना करने वाले सोमनाथ मंदिर की गौरवगाथा, इतिहास और धार्मिक महत्व एक बार फिर चर्चा में है।

 
Somnath Amrit Mahotsav
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Somnath Amrit Mahotsav: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को गुजरात स्थित भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर में आयोजित ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ में शामिल होंगे। यह आयोजन मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान पीएम मोदी विशेष पूजा, महायज्ञ और पहली बार होने वाले कुंभाभिषेक अनुष्ठान में हिस्सा लेंगे। देशभर के 11 पवित्र तीर्थों से लाए गए जल से मंदिर के शिखर का अभिषेक किया जाएगा।

सोमनाथ मंदिर भारतीय आस्था, संघर्ष और पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है। इतिहास में कई बार आक्रमणों और विध्वंस का सामना करने के बावजूद यह मंदिर हर बार नए स्वरूप में खड़ा हुआ और सनातन परंपरा की शक्ति का प्रतीक बनकर उभरा।

वैदिक मंत्रों और महारुद्र यज्ञ से गूंजेगा सोमनाथ

अमृत महोत्सव के दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भव्य श्रृंखला आयोजित की जाएगी। कार्यक्रम में 51 विद्वान ब्राह्मण वैदिक मंत्रोच्चार और रुद्र पाठ करेंगे। इसके साथ ही महारुद्र यज्ञ में 1.25 लाख आहुतियां अर्पित की जाएंगी।

विशेष आकर्षण के तौर पर भारतीय वायुसेना की सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम मंदिर परिसर के ऊपर फ्लाईपास्ट करेगी। इसे सोमनाथ मंदिर के गौरव और भारत की आध्यात्मिक विरासत को सलामी के रूप में देखा जा रहा है।

पहली बार होगा मंदिर शिखर का कुंभाभिषेक

सोमनाथ मंदिर के इतिहास में पहली बार मंदिर के शिखर पर कुंभाभिषेक अनुष्ठान आयोजित किया जाएगा। इसके लिए देश के 11 प्रमुख तीर्थस्थलों से पवित्र जल लाया गया है। वैदिक विधि-विधान के साथ मंदिर के 90 मीटर ऊंचे शिखर का अभिषेक किया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस प्रक्रिया से मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्यता और अधिक जागृत होती है।

क्यों खास है सोमनाथ मंदिर?

सोमनाथ मंदिर को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और सबसे प्राचीन माना जाता है। पुराणों और लोक मान्यताओं के अनुसार यहीं भगवान शिव ने चंद्रदेव को श्राप से मुक्ति दी थी। यह भी माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंतिम लीला इसी क्षेत्र में पूरी की थी।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में निर्मित है। इसका शिखर करीब 155 फीट ऊंचा है और शीर्ष पर स्थापित कलश का वजन लगभग 10 टन बताया जाता है। मंदिर का ध्वजदंड भी विशेष आकर्षण का केंद्र है।

17 बार टूटा, लेकिन नहीं टूटी आस्था

सोमनाथ मंदिर का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 1026 में महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर हमला कर भारी लूटपाट की थी। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक, जफर खान, महमूद बेगड़ा और औरंगजेब के शासनकाल में भी मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया।

इतिहासकारों के अनुसार मंदिर पर कुल 17 बार हमले हुए, लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। यही वजह है कि सोमनाथ को भारतीय सभ्यता और सनातन आस्था की अटूट शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

आजादी के बाद ऐसे हुआ पुनर्निर्माण

देश की स्वतंत्रता के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। 8 मई 1950 को मंदिर पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी गई और 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन किया।

आधुनिक सोमनाथ मंदिर का निर्माण कार्य बाद के वर्षों में पूरा हुआ और इसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में विकसित किया गया।

धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक

सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुनर्जागरण की पहचान बन चुका है। सदियों तक संघर्षों का सामना करने के बाद भी यह मंदिर आज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में आयोजित हो रहा अमृत महोत्सव इसी गौरवशाली विरासत का उत्सव माना जा रहा है।