पितृपक्ष में कब करें श्राद्ध और तर्पण? जानें शुभ मुहूर्त, विधि और किन चीजों से बचें
सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना गया है। यह वह समय होता है जब लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों का आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है।
इस साल पितृपक्ष की शुरुआत शनिवार, 26 सितंबर से हो गई है और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। ऐसे में इस दौरान श्राद्ध और तर्पण करते समय कुछ धार्मिक नियमों का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है।
पितृपक्ष में किन बातों का रखें ध्यान?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में पितरों का तर्पण और पिंडदान करने से उन्हें शांति मिलती है।
श्राद्ध कर्म के दौरान सात्विक भोजन करने की परंपरा है। इस अवधि में लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा से परहेज करने की सलाह दी जाती है। साथ ही पितृपक्ष के दौरान नए कपड़े, आभूषण या महंगी वस्तुओं की खरीदारी से भी बचने की धार्मिक मान्यता है।
श्राद्ध और तर्पण का शुभ समय
शास्त्रों में श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का समय विशेष माना गया है। दिए गए मुहूर्त के अनुसार इस दौरान श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
- सुबह 11:53 बजे से दोपहर 12:43 बजे तक
- दोपहर 1:00 बजे से 3:30 बजे तक
हालांकि, किसी विशेष व्यक्ति की श्राद्ध तिथि और स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग या विद्वान से तिथि की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
कैसे करें पितरों का तर्पण?
पितरों के तर्पण के लिए कुश, काले तिल, जल, जौ और फूल का इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक विधि के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण किया जाता है।
श्राद्ध के दौरान तैयार किए गए भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए निकालने की भी परंपरा है। इसे पंचबलि की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। इस दौरान श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किए गए कर्मों का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।
