Movie prime

नंगे पैर दौड़ने वाली पारुल चौधरी ने रचा इतिहास, एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार जीते दो पदक

एशियन गेम्स में भारतीय धावक पारुल चौधरी ने लगातार दूसरे संस्करण में दो पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 5000 मीटर दौड़ में कांस्य जीतने से पहले उन्होंने 3000 मीटर बाधा दौड़ में भी कांस्य हासिल किया था। गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर अब भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में दर्ज हो गया है।
 
 पारुल चौधरी
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

Parul Chaudhary, Asian Games 2026: गांव की पगडंडियों पर कभी नंगे पैर दौड़कर अभ्यास करने वाली पारुल चौधरी ने एशियन गेम्स में एक बार फिर देश का नाम रोशन किया है। आइची-नागोया में चल रहे एशियाई खेलों में सोमवार को पारुल ने 5000 मीटर दौड़ में 15:14.61 मिनट के समय के साथ कांस्य पदक जीता। इससे एक दिन पहले उन्होंने 3000 मीटर बाधा दौड़ में भी कांस्य पदक अपने नाम किया था।

इन दो पदकों के साथ पारुल ने भारतीय एथलेटिक्स में एक खास रिकॉर्ड बना दिया है। वह लगातार दो एशियाई खेलों में दो-दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला धावक बन गई हैं।

दो दिन, दो दौड़ और दो कांस्य पदक

पारुल के लिए एशियन गेम्स का यह अभियान बेहद खास रहा। रविवार को उन्होंने 3000 मीटर बाधा दौड़ में 9:08.67 मिनट का समय निकालकर कांस्य पदक जीता था। इस प्रदर्शन के दौरान उन्होंने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बेहतर किया।

इसके बाद सोमवार को 5000 मीटर दौड़ में उन्होंने 15:14.61 मिनट के समय के साथ फिर कांस्य पदक हासिल कर लिया। यानी लगातार दो दिनों में पारुल ने दो अलग-अलग स्पर्धाओं में पोडियम फिनिश हासिल की।

पिछले एशियाड में भी जीते थे दो पदक

पारुल चौधरी के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि पिछले एशियाई खेलों में भी उन्होंने दो पदक जीते थे। उन्होंने वहां 5000 मीटर में स्वर्ण पदक और 3000 मीटर बाधा दौड़ में रजत पदक हासिल किया था। इस बार दो कांस्य पदकों के साथ उन्होंने लगातार दो एशियाड में दो पदक जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया।

कभी नंगे पैर दौड़ती थीं पारुल

पारुल की सफलता की कहानी किसी बड़े ट्रैक से नहीं, बल्कि गांव की पगडंडियों से शुरू हुई। 15 अप्रैल 1995 को इकलौता गांव में किसान परिवार में जन्मीं पारुल को बचपन से ही दौड़ने का शौक था। स्कूल के दिनों में संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा। वह सुबह करीब चार बजे उठकर गांव की पगडंडियों पर दौड़ लगाती थीं। कई बार वह नंगे पैर ही दौड़कर अपनी तैयारी करती थीं।

पिता को मिलते थे ताने, बेटी ने पदक से दिया जवाब

पारुल के पिता कृष्णपाल बताते हैं कि जब उनकी बेटी सुबह-सुबह दौड़ने जाती थी तो गांव के कुछ लोग उन पर तंज कसते थे। उनसे कहा जाता था कि बेटी को क्यों दौड़ा रहे हो, क्या उसे फौज में भर्ती कराना है? कृष्णपाल इन बातों को सुनकर चुप रहते रहे, लेकिन बेटी ने दौड़ना नहीं छोड़ा। वक्त बदला और वही पारुल चौधरी अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए पदक जीत रही हैं।

पारुल की लगातार दो एशियाई खेलों में यह दोहरी पदक उपलब्धि सिर्फ एक खेल रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि उन तमाम मुश्किलों और तानों का जवाब भी है, जिनके बीच उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। गांव से लेकर शहर तक उनके इस प्रदर्शन पर खुशी का माहौल है।