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सभी बेसिक शिक्षकों की होगी दस्तावेजों की जांच, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, एक सप्ताह में जमा करने होंगे प्रमाणपत्र
 

 
 सभी बेसिक शिक्षकों की होगी दस्तावेजों की जांच, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, एक सप्ताह में जमा करने होंगे प्रमाणपत्र
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प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्र संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) के पास जमा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही शिक्षकों को नोटरी से प्रमाणित शपथपत्र देकर शिक्षा विभाग में कार्यरत या सेवानिवृत्त अपने निकट संबंधियों की जानकारी भी देनी होगी।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कुसुमलता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने प्रदेश में फर्जी दस्तावेजों के सहारे हुई शिक्षक नियुक्तियों को गंभीर मामला बताते हुए व्यापक स्तर पर सत्यापन कराने के निर्देश दिए हैं।

एक ही शैक्षणिक दस्तावेज पर 10 से अधिक लोगों की नौकरी का मामला

मामले की सुनवाई के दौरान स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जांच का हवाला देते हुए अदालत को बताया गया कि याची ने गोरखपुर के कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय बैरीपार में तैनात सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर नौकरी हासिल की थी।

अदालत को यह भी बताया गया कि याची 12 और 13 अक्टूबर को एसटीएफ के समक्ष उपस्थित नहीं हुईं और सत्यापन के लिए आवश्यक शैक्षणिक दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए। पिछली सुनवाई में उनके अधिवक्ता ने ऑपरेशन के कारण बेड रेस्ट पर होने की जानकारी दी थी।

कोर्ट ने एसटीएफ की जांच के आधार पर कहा कि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्तियां कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई हैं। कुछ मामलों में एक ही शैक्षणिक दस्तावेज के सहारे 10 या उससे अधिक व्यक्तियों के नौकरी करने की बात भी सामने आई है।

शिक्षकों को देना होगा रिश्तेदारों का विवरण

हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी शिक्षक एक सप्ताह के भीतर अपने नियुक्ति पत्र, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेज संबंधित बीएसए कार्यालय में जमा करें।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक शिक्षक को नोटरी से प्रमाणित शपथपत्र देना होगा। इसमें बताना होगा कि उनका कोई निकट संबंधी बेसिक शिक्षा अधिकारी या उससे उच्च पद पर शिक्षा विभाग में कार्यरत है अथवा सेवानिवृत्त हो चुका है या नहीं।

निकट संबंधियों में पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, दामाद, बहू, सास-ससुर, साला, जीजा और चचेरे भाई-बहन सहित अन्य रिश्तेदारों को शामिल किया गया है। यदि किसी शिक्षक का ऐसा कोई संबंधी नहीं है, तब भी उसे इस संबंध में घोषणा पत्र देना अनिवार्य होगा।

अदालत ने सभी बीएसए को तत्काल प्रधानाध्यापकों और प्रभारी प्रधानाध्यापकों के माध्यम से निर्देश जारी कराने को कहा है।

एसटीएफ करेगी दस्तावेजों का सत्यापन

कोर्ट के आदेश के अनुसार, शिक्षकों से दस्तावेज प्राप्त होने के बाद बीएसए को प्रत्येक शिक्षक का नाम, नियुक्ति की तारीख, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता और मेरिट सहित अन्य विवरणों की एक्सेल शीट तैयार करनी होगी।

यह विवरण संबंधित दस्तावेजों के साथ एसटीएफ की क्षेत्रीय इकाई को भेजा जाएगा। एसटीएफ के रेंज प्रमुख जांच और सत्यापन की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। आवश्यकता पड़ने पर पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की सहायता भी ली जा सकेगी।

शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, मध्याह्न भोजन और यूनिफॉर्म जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या घटने और विद्यालयों के बंद होने की समस्या सामने आई है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि इसके पीछे शिक्षकों की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। अदालत के अनुसार, एक अच्छे शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी शिक्षण क्षमता, नियमित उपस्थिति, बच्चों के प्रति धैर्य और निष्पक्ष व्यवहार भी आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति नियुक्ति की शुरुआत ही धोखाधड़ी से करता है, उससे बच्चों के विश्वास और शिक्षा की जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

फर्जी नियुक्तियों पर वेतन वसूली और कार्रवाई का निर्देश

हाई कोर्ट ने 22 जनवरी 2026 को गरिमा सिंह बनाम राज्य मामले में समन्वय पीठ द्वारा दिए गए आदेश का भी उल्लेख किया। उस आदेश में फर्जी तरीके से हुई नियुक्तियों को निरस्त करने, वेतन की वसूली करने और ऐसी नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर विभागीय एवं दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे।

इसके लिए छह महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई थी।

लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की तय होगी जवाबदेही

अदालत ने स्पष्ट किया कि बीएसए द्वारा की जाने वाली कार्रवाई की निगरानी शिक्षा निदेशक करेंगे, जबकि एसटीएफ की जांच और सत्यापन प्रक्रिया की निगरानी अपर पुलिस महानिदेशक, एसटीएफ के स्तर से की जाएगी।

कोर्ट ने चेतावनी दी कि आदेश के अनुपालन में किसी भी अधिकारी की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को होगी। इस दिन संबंधित अधिकारियों को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश के पालन में प्रशासनिक कठिनाइयां या संसाधनों की कमी सामने आती है, तो अधिकारी अगली सुनवाई से पहले इसकी जानकारी कोर्ट को दे सकते हैं।