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UP में ई-रजिस्ट्री मॉड्यूल पर सरकार का यू-टर्न: 25 दिन में आदेश रद्द, 32 जिलों में विरोध के बाद फैसला
 

 
 UP में ई-रजिस्ट्री मॉड्यूल पर सरकार का यू-टर्न: 25 दिन में आदेश रद्द, 32 जिलों में विरोध के बाद फैसला
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने संपत्ति की रजिस्ट्री प्रक्रिया को डिजिटल और सरल बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए ई-पंजीकरण मॉड्यूल संबंधी आदेश को वापस ले लिया है। महानिरीक्षक निबंधन नेहा शर्मा द्वारा 4 जून को जारी आदेश को सोमवार देर शाम निरस्त कर दिया गया। अधिवक्ताओं और डीड राइटर्स के लगातार विरोध तथा 32 जिलों में निबंधन कार्यालयों का कामकाज प्रभावित होने के बाद सरकार ने यह फैसला लिया।

स्टांप एवं पंजीयन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रवीन्द्र जायसवाल ने बताया कि ई-पंजीकरण मॉड्यूल संबंधी आदेश स्पष्ट नहीं होने के कारण अधिवक्ताओं और डीड राइटर्स के बीच कई तरह की आशंकाएं पैदा हो गई थीं। कई स्थानों पर यह भ्रम फैल गया कि नई व्यवस्था से उनका रोजगार प्रभावित होगा और भविष्य में जनसेवा केंद्रों के माध्यम से रजिस्ट्री कराई जाएगी।

इसी भ्रम के चलते प्रदेश के 32 जिलों में अधिवक्ताओं ने निबंधन कार्यालयों में कार्य का बहिष्कार कर दिया, जिससे संपत्तियों की रजिस्ट्री का काम प्रभावित हुआ और आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

मंत्री ने कहा कि सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने फिलहाल 4 जून का आदेश वापस लेने का निर्णय लिया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में अधिवक्ताओं, डीड राइटर्स और अन्य संबंधित पक्षों से व्यापक संवाद कर रजिस्ट्री प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सरल और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में आगे कदम उठाए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, 32 जिलों में रजिस्ट्री कार्य ठप होने की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचने के बाद उन्होंने मामले पर नाराजगी जताई और आदेश को तत्काल वापस लेने के निर्देश दिए। इसके बाद विभागीय मंत्री ने अधिकारियों के साथ बैठक कर आदेश निरस्त करने का फैसला कराया।

दरअसल, ई-पंजीकरण मॉड्यूल लागू होने के बाद विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद, औद्योगिक विकास प्राधिकरण और अन्य सरकारी संस्थाओं की संपत्तियों की रजिस्ट्री के लिए उपभोक्ताओं को निबंधन कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं रहती थी। संबंधित प्राधिकरण के अधिकृत अधिकारी ऑनलाइन माध्यम से दस्तावेज उप निबंधक कार्यालय भेजते थे और पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दस्तावेज भी ऑनलाइन वापस भेज दिए जाते थे।

हालांकि, अब आदेश रद्द होने के बाद पूर्व व्यवस्था फिर से लागू होगी। इसके तहत क्रेता, उसके अधिवक्ता या डीड राइटर को संबंधित प्राधिकरण से निर्धारित प्रारूप में लेखपत्र (डीड) तैयार कर स्वयं उप निबंधक कार्यालय में प्रस्तुत करना होगा।

सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं और डीड राइटर्स की नाराजगी को देखते हुए सरकार ने फिलहाल विवादित आदेश वापस लेने का निर्णय लिया है।